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तलाश

ख्यालों में आने वाली  मेरी जिन्दगी में आओ मेरी जिन्दगी संवारो  मेरी संगिनी हो जाओ मेरी कल्पना के साथी मैं  दीया हूँ  तू है बाती है नैराश्यपूर्ण अँधेरा आशा का दीप जलाओ ढूंढा  बहुत जहाँ में मिला ना मीत मन का तलाश कर दो पूरी मनमीत बन के आओ बरसों से हूँ मैं प्यासा एक बूंद प्रेम खातिर जो मिला नहीं है मुझको वो प्यार तुम बरसाओ तनहा हूँ मैं  सफ़र में अपनों का साथ छुटा  ना फिक्र है जहाँ की गर हमसफ़र बनाओ शिकवे गिले अगर हों सुलझाएं प्यार से ही तकरार में भी गोरी तुम प्यार ना भुलाओ ख्यालों में आनेवाली  मेरी जिन्दगी में आओ (पूर्वलिखित : जून 2002)

जीवन की सार्थकता

परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् अर्थात : यह संसार परिवर्तनशील है और इस परिवर्तनशील संसार में जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।

दीपावली की याद

दीपावली की एक तनहा रात रौशन दीयों का जगमग साथ उमड़ते-घुमड़ते कुछ ख़यालात दीपों की आवली की तरह नहीं आसमान में आतिशबाजी की तरह कौंध जाते हैं रह-रह कर याद आते हैं चंद चेहरे बड़ी शिद्दत के साथ और कई चेहरे एक मुद्दत के बाद कैसे होंगे वे जो बिछड़ गए जिन्दगी के किसी मोड़ पर और छोड़ गए खट्टी -मीठी यादें क्या उनकी यादों में मैं भी हूँगा कहीं चंद लम्हों का साथ जो खत्म हो गया इन दीयों की तरह इन्ही यादों में कहीं मेरा गाँव मेरा घर कुछ नए, पुराने होते हुए कुछ पुराने, नए होते हुए इन नए-पुराने के बीच मैं हूँ कहीं नया या पुराना?

विवशता

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इस करतब के बदले मिले दो -चार रुपये क्या  इसकी किस्मत बदल सकते हैं? शायद नहीं.

क्षद्म चेहरे

अजीब है ये दुनिया अजीब हैं इसके रंग लोग  लिपटे हैं क्ष्द्मावरण में और चलते हैं संग संग क्षद्म चेहरे को छुपाने के क्रम  में अनावृत होती सच्चाई एक घिनौनी परछाई अंकित करती है मेरे मन पटल पर एक गहरी उदासी

विवश पल

उनका आना  एक लम्बे समय बाद  कितनी बातें थीं करने को क्या-क्या सोचा था होने को कुछ भी तो नहीं कह पाया सिर्फ देखता रहा गुजरते हुए पलों को मजबूर क्षणों को  वे चले गए  मुझे छोड़कर पछताने को क्या करूँ मैं अपना  विवश ग़म  कैसे सुनाऊं ज़माने को  फिसलते पलों को देखते रह जाने की मजबूरी मेरी कांपते होठों पर अटकी हुई  कहानी मेरी कुछ कह नहीं पाता सारे शब्द पता नहीं कहाँ खो जाते हैं क्या वे सुनते हैं? मेरी ख़ामोशी की आवाज़.

जीवन का प्रवाह

जीवन का कोई अनुभव स्थाई और चिरंतन नहीं. जीवन की स्थिति समय में है और समय प्रवाह है. प्रवाह में साधु-असाधु, प्रिय-अप्रिय सभी कुछ आता है. प्रवाह का यह क्रम ही सृष्टि और प्रकृति की नित्यता है. जीवन के प्रवाह में एक समय असाधु, अप्रिय अनुभव आया इसलिए उस प्रवाह से विरक्त होकर जीवन की तृषा को तृप्त न करना केवल हठ  है.  निरंतर प्रयत्न ही जीवन का लक्षण है. जीवन के एक प्रयत्न या एक अंश की विफलता से पूर्ण जीवन की विफलता नहीं है.                                                                                               ...पुस्तकांश....दिव्या(यशपाल)